#532. जब शायर की कलम खामोश रहे… ( Jab Shayar ki Kalam Khamosh rahe)

Writer, लेखक, शायर या फिर कवी इन सब की ज़िंदगी में ऐसा पल हमेशा आता है जब ये शब्दों को अपनी कला के इत्र से सुगंधित करते हैं, ये जो भी लिखते है वो हीरा बन जाता है, और इन्हें ये गुमाँ हो जाता है कि इनकी शब्दों की श्याही कभी सूखेगी नही।

पर इनके जीवन में एक वक़्त ऐसा भी आता है जब इनके पास शब्द तो बहुत होते है, भाव भी होता है, पर कलम नहीं चलती है।

ये कुछ ऐसा ही है जैसे किसी से मोहब्बत हो जाये आप कहना तो बहुत कुछ चाहो पर कुछ कह ना पाओ।

———————————-

———————————

   दिल में एक दर्द उठे,

   इज़हार न कर पाने की कसक चुभे।

   ऐसा ही कुछ शायर के साथ होता है,

   दिल की किताब के पन्नो को फाड़कर,

   वो सारी रात रोता है।।

———————————————————————–
मैं कोई शायर तो नहीं, पर हाँ थोड़ा बहुत लिख लेता हूँ। मेरे साथ भी कुछ ऐसा ही हो रहा है कुछ दिन से, लिखना चाहता हूँ पर लिख नही पाता हूँ।।

हमे खुद से ही लड़ना पड़ता है, ऐसा एहसास होता है मानो की वो लिखने की काबिलियत मुझसे रूठकर मायके चली गई हो, और बिन उसके लिक्खु कैसे।।

*****************

अब उसे मनाने का वक़्त है,

क्योंकि बिन उसके जीवन चलेगा नहीं।

और अगर वि हमेशा के लिए रूठ गई,

तो ” दिल की किताब ” का अस्तित्व रहेगा नहीं।।

******************

पिछले कुछ वक़्त से जो बीत रहा है मेरे साथ उसे एक पन्ने पर उतारा है-

कुछ पन्ने कोरे हैं,

कुछ तोड़े मरोड़े है।

कुछ पर श्याही फैली है,

कुछ ने अंतिम साँस लेली है।।

शब्दों का अंबार भरा है दिल में,

भावनाओं की नदियाँ बह रही हैं।

सब मशगूल है अपनी ज़िंदगी में,

कोई तो सुनो मेरी कलम क्या कह रही है।।

मैं लिखता हूँ,

मिटाता हूँ।

कुछ दर्द दिखाता हूँ,

कुछ छिपाता हूँ।।

मैं कल तक कहता था- मेरे शब्द ही मेरी पहचान है।

आज ये बिखरे हुए हैं, मानो शब्दों का कोई शमशान है।।

क्या लिक्खु कलम से दर्द किसी और का जब अपने दिल की हालत नाजुक हो।

जरुरी तो नही हर बार पढ़ने वाला भावुक हो।।

टूट सा गया हूँ कुछ इस तरह की खड़ा नहीं होना चाहता हूँ।

अटक गया हूँ शब्दों के जाल में और निकलना नही चाहता हूँ।।

कमी नही है कहानियों की पास मेरे।

पर शब्द रुपी मोती को धागे में पिरो देने का तरीका भूल गया हूँ।।

मोती बिखर चुके है,

धागा टूट गया है।

दिल में शब्द हज़ारों है,

पर कलम का साथ छूट गया है।।

सोचता हूँ फिर कारवाँ शुरू कर लिखने का।

पर अब डर लगा रहता है गिरने का।।

क्या हुआ जो कलम रुक गई है।

अब शब्दों की श्याही नई है।।

नया सफर होगा,

नया अवतार होगा।

नई कहानी होगी,

मेरी ज़ुबानी होगी।।

कलम जो रुकी थी कुछ देर,

अब दौड़ने लगेगी।

कुछ पन्ने खाली रह गए थे,

अब मेरे दिल की किताब भरी मिलेगी।।

मैं लिक्खूँगा पर साथ आपका चाहिये होगा,

अच्छा लिक्खु या बुरा सब आपके हवाले होगा।।

मैं हमेशा लिखता हूँ बस इतनी सी करना कामना।

जो लड़खड़ायें कदम फिरसे, तो तुम मेरा हाथ थामना।।

©mयंक


Advertisements

#450. एक कहानी, जो शुरू होते ही खत्म हो गई….

image

तेरी गली,.

तेरा मोहल्ला ।

तेरी गली के बच्चे,

आज भी याद है वो शोरगुल,
वो हल्ला ॥

मेरा तेरी गली में आना ।

तेरा खिड़की से झांकना,
मुझे देख अंदर चले जाना ॥

तेरा भाई,

जिसने मुझसे शिद्दत से दुश्मनी निभाई ॥

रोक कर वो मुझे पूछता –

”काम क्या है,

“बहुत आता है तू इधर, तेरा नाम क्या है,

तू मुझे जानता नही मैं कौन हूँ,

जिस मोहल्ले में तू खड़ा है,
मैं वंहा का डॉन हूँ.”॥

मैंने कहा-

“तू इतना क्यूँ इतराता है,।

चार फुट का है नही,
अकड़ किसे दिखाता है.”॥

नोक-झोंक हुई, फिर हल्ला हो गया,।

शोर सुन वहां इकठ्ठा मोहल्ला हो गया.॥

सबकी जुबां पर एक ही सवाल था…

“क्या हुआ, माज़रा क्या है,,

तुझे कभी देखा नहीं,
क्या तू इस मोहल्ले में नया है” ॥

मैं बोला-

“ना मैं नया हूँ, और ना इस गली का..

घूम रहा था, तो रुख किया इस गली का…”

उसका भाई बोला-

“इन जैसों को मैं खूब जानता हूँ,

ये गली में आते किस इरादे से है,

आज इसे मैं इसकी औकात बताता हूँ…”

फिर वंहा ज़ूबानी लड़ाई हो गई,।

अगले ही पल हाथापाई हो गई.॥

बीचबचाव हुआ, हमे अलग किया गया,।

एक दुसरे से माफ़ी मंगवाई गयी,
फिर दोनों को समझाया गया.॥

लोगों ने मामला सुलझाया,
जैसे पंचायत में सुनवाई हो गई,।

गली में फिर ना आने की चेतावनी दे,
मेरी वंहा से विदाई हो गई.॥

फिर मेरा उसकी गली में जाना बंद हो गया,।

ऐसे ही मेरी शुरू होती कहानी का अंत हो गया.॥
❤ ©मयंक ❤

#449. जब तक लिखते रहे, तब तक बिकते रहे हम…

जब तक लिखते रहे,
तब तक बिकते रहे हम।
किसी के साथ खुशियाँ बांटी,
किसी के बांटे गम॥
जब तक मिलती रही कमियाबी,
सबने  मिलाए मेरे कदम से कदम।
जो घिरे परेशानियों में,
रुकी कलम,
जो कल तक साथ थे,
वो आज भूल गए की कौन है हम॥
❤ ©मयंक ❤

image

Jab tak likhte rhe,
Tab tak bikte rahe hum.
Kisi ke saath ke saath khushiyaan banti,
Kisi ke baante gum..
Jab tak milti rhi kamiyabi,
Sabne milae mere kadam se kadam.
Jo ghire pareshaniyon me,
Ruki kalam,
Jo kal tak saath the,
Vo aaj bhool gae ki kaun hai hum.

#447. मेरा बेटा मुझसे बड़ा हो गया है…

Jo kal tak ghutno ke bal nhi chal pata tha,
Aaj vo mujhe aankhen dikhaane lga hai
Budhapa kya aya mujhe,
Aaj Vo mujhe akal sikhane lga hai.
Kal tak kie the jiske har shauk poore,
Aaj vo mujhe mere chasme ki keemat btaane lga hai.
Galti hoti to pyaar se smjhata tha jise,
Aaj mujhse glti hone pr gaali dene lga h..
Jise sikhaya mene jeene ka treeka,
Aaj vo mujhe tameez sikhane lga h.
Jiske lie lutaya apne Zeevan ka har sukh,
Aaj vo mujhe meri dawaai ki keemat btaane lga h..
.
“” Me uske lie chota ho gya huu,
Or Aaj Mera beta mujhse bda ho gya h,
“”
❤ ©मयंक  ❤

#433. सच्चे रिश्ते…

image

सच्चे रिश्ते दिल ढून्ढ लेता है,
मुसाफिर अपनी मंजिल ढून्ढ लेता है।
तूफ़ान भटका देते है रास्ता कभी कभी,
पर बुलंद हौसले रखने वाला साहिल ढून्ढ लेता है॥
❤ ©मयंक ❤

#403. सत्य बुढ़ापे का.. ( Satya Budhape Ka )

सुबह का वक़्त था,
ठन्डी हवाओं के झोंके ।
हसीं मौसम,
इस फिजा में खोने से खुद को कौन रोके ॥
लोग अपने अपने घरों से निकल रहे थे…
कुछ व्यायम कर रहे थे ।
तो कुछ टहल रहे थे ॥
एक शख्स दिखा कुछ बुजुर्ग सा…
उम्र जवाब दे चुकी थी उसकी,
पर इरादों में दम उसके अभी भी बाकी था ।
पैर जवाब दे गए थे,
लाठी ही उसकी अब साथी थी ॥
उस बुजुर्ग को देख दया और जिज्ञासा के भाव जागे ।
मैं जंहा था, वही ठहर गया,
इस सोच में की क्या होता है आगे ॥
वो चलता,
फिर रुकता ।
सांस उखड्ती,
वो सीने पर हाथ रखता ॥
एक कदम चलता,
दो पल रुकता ॥
कंप-कम्पते हाथों से लाठी को आगे बढ़ाता ।
लोग अपनी धुन में खोए थे,
वो भी लोगों के साथ ताल से ताल मिलाने की कोशिश करता ॥
इस कोशिश में उसकी लाठी डगमगा गई ।
उसका पैर फिसला,
वो गिर गया,
आवाज़ हुई,
मानो उसकी हड्डियाँ कराह गई ॥
मैं पहुंचा..
उसे उठाया,
सहरा दे, उसे बिठाया ॥
मैं बोला- बाबा, जब शरीर इतना नाजुक है, तो क्यों करते हो प्रयास चलने
का ।
शरीर जब जवाब दे चूका है, तो क्यों सोचते हो घर से निकलने का ॥
बुजुर्ग बोला- बेटा तुम दिल के नेक लगते हो,
तुम्हे मैं एक किस्सा सुनाता हूँ ।
मेरे इस प्रयास का राज़ बताता हूँ ॥
मैं था तम्हारी तरह नौजवान कभी ।
काम के समय…
भूक, थकान क्या होती है मेने जाना नही कभी ॥
मेहनत मेने ताउम्र खूब की,
उसका फल भी मिला ।
एक हंसता खेलता परिवार था मेरा ॥
मैं कमाता गया ।
अपने बच्चों पर उड़ाता गया ॥
मेने सोचा मेरी जिंदगी के आखरी समय में ये समुन्द्र का किनारा बनेंगे ।
मेरे बच्चे मेरा सहारा बनेंगे ॥
वक़्त बीतता गया,
बुढ़ापा आने लगा ।
मेरा बेटा मुझसे ज्यादा मेरी दौलत को चाहने लगा ॥
जब तक मैं काम करता था घर का मालिक मैं था ।
वक़्त जवान रहा मैं बूढा हो गया, शायद वो मेरा बुरा समय था ॥
जेसे पेड़ की उम्र हो जाने पर काट दिया जाता है ।
घर में बड़े का समय पूरा होने पर सबका हिस्सा बाँट दिया जाता है ॥
मेरे ही बेटे मी दुश्मन हो गए ।
जिससे सहारे की उम्मीद थी, वो ही सांप के फन्न हो गए ॥
मेरा क्या कसूर,की मेने उन्हें एक कुम्हार की तरह आकार दिया ।
मेरा वक़्त आने पर उन्होंने मुझे ही घर से निकाल दिया ॥
ना मेरी परवरिश में खोट था, ना मेरे स्नेह में कमी ।
बुजुर्ग अपनी आप-बीती सुना रहा था, उसकी आँखों में थी नमी ॥
वो बोला- किसी और से सहारे की उम्मीद क्या करू,जब मेरे अपनों ने
धोका दे दिया ।
बुजुर्ग ने लाठी उठाई,और वो फिर चल दिया ॥
उसके डगमगाते कदम…
उसकी लडखडाती चाल ।
वो बिन पूछे ही कर गया मुझसे एक सवाल ॥
“क्या अपने ही बेटों से सहारे की उम्मीद करना गुनाह है…..?????”

#390. ना मैं शायर हूँ, ना मैं कवी हूँ…।

image

ना मैं शायर हूँ, ना मैं कवी हूँ…।
मैं शख्स-ऐ-आम हूँ, मुझे लिखने दो…॥
ना  मैं  ख़ुशी  हूँ, ना मैं गम हूँ….।
बस एक कल्पना हूँ, मुझे पन्नो पर उतरने दो…॥
ना मैं आशिक हूँ, ना मैं किसी के दिल मैं क़ैद हूँ…।
मैं  तो एक आज़ाद पंछी हूँ, मुझे खुले आस्मां मैं उड़ने दो…॥
ना किसी से चाहत है, ना किसी को चाहता हूँ….।
बस मेरी कल्पना की मोहब्बत को, हकीकत के पन्नो पर उकेरने दो…॥
ना कवी हूँ, ना मैं रवि हूँ….।
तुम मुझे मेरी कला के रंग को दुनिया में  बिखेरने दो…॥
अपने लेखन के लिए,मुझे कोई मान-सम्मान का लोभ नहीं…।
मैं तो एक मदमस्त हाथी हूँ मुझे अपनी राह पर बढ़ने दो…॥
ना किसी को रुलाना चाहता हूँ न किसी को मनाना चाहता हूँ….।
मैं तो एक दर्पण हूँ, मुझे  समाज को उसका चेहरा दिखाने दो……॥
~मयंक

#388. बुलंद हौसला।

हौसले बुलंद हो, तो समुन्दर में तुफानो का सामना किया जा सकता है।

हौसलों में जान न हो, तो एक हवा का झोंका भी नाव डुबा जाता है॥

❤ #मयंक ❤

#382. एक तरफ़ा मोहब्बत ॥

मेरी एक तरफ़ा मोहब्बत,
मेरा एक तरफ़ा प्यार था।
उससे मोहब्बत का जूनून मेरे सर पर सवार था॥
उसे न मुझसे मोहब्बत थी न,
मुझसे प्यार था॥
सुबह होती थी उसके मीठे ख़्वाबों के साथ,
फिर आईने पर रोज़ इज़हार होता था।
आईने में वो दिखती थी,
कैसा लग रहा हूँ सवाल मेरा उससे होता था,
आज इज़हार करुंगा ये फैसला कर मैं तैयार होता था॥
रहती थी वो सामने घर के मेरे,
छत्त पर रोज़ होता था इंतज़ार उसका।
फिर ढ़लती शाम में उसक दीदार होता था॥
देख उसे सामने अपने,
मैं खो जाता था ख़्वाबों मैं।
मेरे साथ हो रहा था वैसा,
जैसा लिखा था मोहब्बत की किताबों मैं॥
फिर कुछ बातें होती थी,
कुछ हंसी मजाक के पल
कुछ इधर उधर की बातें,
और रोज़ की हसीं मुलाकातें॥
वो छत्त से उतरने को मुड़ती थी,
यंहा धड़कने बढती थी।
क्युकी इज़हार करने की इच्छा मन्न में उमड़ती थी,
उसे लगाकर आवाज़ मैं इज़हार करने का खुद से फैसला करता था॥
वो मुडकर पूछती थी “बात क्या है”,
रोज़ की तरह आज भी – ” कुछ नहीं ” कहना है, या फिर आज कुछ नया है।
खुद से कर वादा अगले दिन का, मैं आज इज़हार का फैसला टाल देता था,
कहकर- “कुछ नहीं ” हम अपनी धडकनों को सम्भाल लेता था॥
दिन गुजरता था दीदार में उसके,
फिर बारी रात की आती थी,
उससे केसे करूं इज़हार ये बात मुझे सताती थी।
मैं पलकें बंद करता था तो तस्वीर उसकी नजर आती थी॥
दिन बीते,
महीने बीते,
साल बदला,
ये मौसम बदले,
नही बदला तो वो था-
मेरा इंतज़ार,
मेरा इज़हार,
मेरी मोहब्बत,
मेरा प्यार॥
आज वो मेरे दरवाज़े पर आई,
उसने आवाज़ लगाई।
मेने दरवाज़ा खोला,
“क्या काम है ” उससे बोला॥
वो बोली- “अरे बाबा सब बताती हूँ”
बात क्या है, ये मैं तुम्हे समझती हूँ,
कुछ दिन बाद मेरी शादी है,
मैं तुम्हे न्योता देने आई हूँ।
बात उसकी सुन मेरे नीचे से ज़मीन खिसक गई,
मैं कुछ बोल ना सका, मेरी सांस अटक गई॥
मैं खामोश था,
आँखें भरी थी।
ये सपना था या सच,
ना जाने ये कैसी घडी थी॥
उसकी बात सुन्न मैं संभल न सका।
इज़हार करना चाहता था,
पर मुख से कुछ निकल न सका॥
अगले ही पल आँखों के सामने अँधेरा छा गया,
मानो मेरा अंतिम समय आ गया ।
कुछ ही पल में मैं होश खो बेठा,
आँखें खुली तो पाया, मैं अस्पताल में था लेटा॥
मेरा समय निकट था,
इज़हार का आखरी मौका।
उठा कागज़ कलम,
फिर मेने खुद को नही रोका॥
मैं कागज़ पर लिखता रहा,
मेरी पलकों से समुन्दर बहता रहा।
मैं जो लिखता वो मिट जाता था,
क्यूंकि आंसूं का पर्दा सिहाई पर चढ़ जाता था॥
इस आंसू और सिहाई की जंग में जीत आंसू की हुई,
पन्ना कोरा रहा,
इज़हार अधुरा रहा,
अरमान दिल में दबे रहे,
मेरा समय पूरा हुआ॥
फिर ये साँसे भी रुक गई,
मेरी अधूरी मोहब्बत कोरे कागज़ के कफ़न में दफ़न हो गई॥
मेरी अधूरी मोहब्बत कोरे कागज़ के कफ़न में दफ़न हो गई॥
मेरी अधूरी मोहब्बत कोरे कागज़ के कफ़न में दफ़न हो गई॥

#380. भ्रूण हत्या की एक कहानी, मेरी जुबानी

अपनी कलम से मैं अपना एक दर्द लिखने जा रहा हूँ।
ना ये शायरी है,
ना ये कविता…
मैं तो बस दर्द-ऐ-ज़खम लिखने जा रहा हूँ।
॥॥॥॥॥॥॥॥॥॥॥॥॥॥॥॥॥॥॥॥॥॥॥॥
नयी नयी हुई शादी थी घर उनके,
बहु आई थी उनके द्वार।
स्वागत हुआ ऐसे ,
जेसे लक्ष्मी आई हो उनके द्वार॥
वो बहु उस घर में घुलने-मिल्ने लगी।
उस घर का एक महत्वपूर्ण अंग बनने लगी॥
एक दिन उसने खुशखबरी अपने पति को सुनाई।
उसके पति को ये बात बहुत रास आई॥
वो दौड़ा, गया अपनी माँ के चरण में।
बोला- माँ कुछ समय बाद एक बच्चा होगा आपकी शरण में॥
माँ उत्साहित थी की कुछ ही दिनों में उसके घर किलकारी गूंजेगी।
पर उसके मन्न में एक सवाल था- लड़का है या लडकी ये बात कैसे पता चलेगी॥
माँ को ये सवाल अंदर ही अंदर खाए जा रहा था।
कंही बेटी न हो जाए ये डर उसे संताए जा रह था॥
वो एक दिन बेटे को पास बुलाकर बोली-
बेटा देख मुझे लड़का चाहिए किसी भी हाल में।
लड़की हुई तो उसे फ़ेंक देना मृत्यु के जाल में॥
लड़का माँ की बात सुन सकपका गया।
वो बोला- कैसी बात करती हो माँ, तुझे क्या हो गया॥
लड़का हो या लडकी ये तो इश्वर के हाथ में है।
हमे स्वीकार है जो होगा, हमारी किस्मत हमारे साथ में है॥
आया दिन खुशियों  का,
उनके आँगन किलकारी गूंजी।
उनके घर फूल सी कन्या हुई,
सास बोली- अब तो दहेज़ में जाएगी सारी जमा-पूंजी॥
पल बीते,
दिन बीता।
साल बीते,
वक्त बीता ॥
सास के कान में खबर आई फिर होने वाले नन्हे मेहमान की ।
सास बोली बेटे से- या तो मुझे पोता दे वरना में शक्ल देखूंगी कब्रिस्तान की॥
माँ की बातें सुन बेटे के पैर के नीचे से ज़मीन खिसक गई।
उसकी जिंदगी अब दो-राहे पर अटक गई॥
उसने ये बात अपनी पत्नी को बताई।
पत्नी की फिर आँखें छलक आई॥
पत्नी ने किया इनकार परिक्षण से।
पति बहलाने-फुसलाने लगा,
ठीक नही लगा कुछ, उसके लक्षण से॥
पत्नी फिर झांसे में आ गई।
वो परिक्षण के लिए मान गई॥
लिंग जांच कानूनन अपराध है, ये बात पति को पता थी।
पर करानी तो है जांच ये दुविधा थी॥
पति ने फिर पता लगवाया।
एक चिकत्सक जो ये जांच करता है, किसी ने ये बतलाया॥
पति-पत्नी पहुँचे चिकित्सक के पास।
क्यूंकि वही था उनकी आखरी आस॥
चिकित्सक फिर लिंग जांच करने लगा।
अपना धर्म, कर्तव्य, कर्म, पेशा,
वो उसे बेचने लगा॥
वही हुआ जो सास को आशंका थी।
गर्भ में एक मासूम सी कन्या थी॥
बेटे ने फिर अपनी माँ को सच्चाई बताई।
पर माँ को ये बात रास ना आई॥
माँ बोली- तब तक तक घर मत आना।
पहले उसे गिराओ, फिर मुझे अपनी शक्ल दिखाना॥
सास और पति के दबाव में एक माँ आ गई।
ना जाने उस पल, उसकी ममता कंहा गई॥
चिकित्सक ने फिर अपना काम शुरू किया ।
औजारों का ज़खीरा उसने लाकर रक्ख दिया॥
फिर डाल औज़ार वो माँ के गर्भ में उसे टटोलने लगा।
मानो एक सांप अपना शिकार खोजने लगा॥
औज़ार पास आता देख वो कन्या सेहेमने लगी।
“माँ मुझे बचालो” वो ये कहकर चीख-पुकार करने लगी॥
वो औज़ार फिर उस कन्या को छोटे-छोटे टुकड़ों में काटने लगा था।
उस निर्दई चिकित्सक ज़रा भी दया न आई,
मानो जेसे एक लाकडहार पेड़ काटने में लगा था॥
वो अंग काटता गया,
कन्या चीखती रही,
वो अपने पाप के कार्य में आगे बढ़ता रहा।
कन्या की साँसे उखड्ती रहीं॥
हर अंग कट चूका था, सिर्फ एक बाकी था।
आसान काम तो हो गया था,
मुश्किल अभी बाकी था॥
चिकित्सक ने फिर औज़ार बदला, क्यूंकि अब सिर बचा था।
बेरहम क़त्ल तो हो  चूका था,
उसपर मात्र एक औपचारिकता की मोहर लगना बाकि था॥
हर अंग काटा गया, सिर को तोड़ा गया।
मानो अखरोट को पत्थर से फोड़ा गया॥
सिर के फिर सेकड़ो टुकड़े हो गए।
ना जाने इंसान कब और केसे इतने निर्दई हो गए॥
कसाई सा उसका व्याक्तित्व था।
उस चीर-फाड़ के बाद वो औज़ार खून से लत-पत था॥
केसे एक बाप का दिल इतना छोटा हो गया।
पैसे देकर जो वो अपनी बेटी का ही कत्ल करवा गया॥
वो घर लौटे तो सास के चेहरे पर एक चमक थी।
जेसे हत्या न करवाई हो, उसने जीती कोई जंग थी॥
ना हत्या का गम, न चेहरे पर कोई शिकन का भाव था।
उसके चेहरे पर थी तो चमक, पर उसके व्यक्तित्व में इंसानियत का अभाव था॥
मैं आज लिख नही रहा, रो रहा हूँ,
आज कलम सिहाई से नही, आंसुओं से भिगो रहा हूँ॥
मेरे कुछ सवाल है दुनिया वालों तुमसे-
अगर बेटी बरदाश नही,
तो बहु क्यों चाहिए…?
जीवन-संगिनी क्यों चाहिए..???
पत्नी की कोख में कन्या पसंद नहीं।
तो नवरात्रों में कन्या क्यों चाहिए….????
पत्नी की बेटी बरदाश नही,
तो माँ क्यों चाहिए…..???
एक माँ के अंग को तुम नष्ट कर देते हो।
तो अर्धांगिनी क्यों चाहिए…..???
तुम्हे बेटी पसंद नही,
तो अपने लड़के के लिए बहु क्यों चाहिए….???
तुम्हारे वंश को आगे बढ़ने वाली,
उस वंशज को जन्म देने वाली माँ क्यों चाहिए…????
मेरे सवाल लाज़मी समझो तो मेरी बात पर गौर करना।
वरना इस श्रृष्टि के अंत की प्रतीक्षा करना॥
Note- मेने भ्रूण हत्या के तरीके का यंहा ज़िक्र किया है, अगर किसी को मुझसे आपत्ति हो तो वो youtube पर भ्रूण हत्या का video देख सकता है।

और विज्ञान इस बात को साबित कर चूका है की लड़का या लड़की होना महिलाओं पर नहीं पुरुष पर निर्भर करता है,

तो आप अपनी पत्नी या बहु को कन्या के होने का दोष न दे।

लड़का लड़की एक समान।

ये बात कब समझेगा इंसान॥